जो मन में आता लिखती हूँ
जो दिल को भाता लिखती हूँ
जज्बातों को अपने लिखती हूँ
एहसासों को अपने लिखती हूँ
कोरे कागज पर लिखती हूँ
सुबह-शाम लिखती हूँ
दिल के अरमान लिखती हूँ
दिल से लिखती हूँ
ना साहित्यकार हूँ
ना कहानीकार हूँ
ना कवयित्री हूँ
ना लेखिका हूँ
सिर्फ कलम से
मन के भावों को लिखती हूँ
कलम को सहेली बना
गुफ्तगू करती हूँ
दिल की ख़ुशी के लिए
लिखती हूँ
मन के सुकून के लिए
लिखती हूँ
दिल की तसल्ली के लिए
लिखती हूँ
रूह के सुकून के लिए
लिखती हूँ
समझने वाले यूं ही
समझ लेते हैं कि
मैं एक रचनाकार
कवि या लेखक हूँ
पर मैं,
वास्तव में अपनी
मां की छवि हूँ
कलम से खेलती हूँ
और जो मन में आए
बेझिझक पन्नों पर उतार देती हूँ।।
-ममता तिवारी
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