आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पन्नों पर उतार देती हूँ:.....

                
                                                         
                            जो मन में आता लिखती हूँ
                                                                 
                            
जो दिल को भाता लिखती हूँ
जज्बातों को अपने लिखती हूँ
एहसासों को अपने लिखती हूँ

कोरे कागज पर लिखती हूँ
सुबह-शाम लिखती हूँ
दिल के अरमान लिखती हूँ
दिल से लिखती हूँ

ना साहित्यकार हूँ
ना कहानीकार हूँ
ना कवयित्री हूँ
ना लेखिका हूँ

सिर्फ कलम से
मन के भावों को लिखती हूँ
कलम को सहेली बना
गुफ्तगू करती हूँ

दिल की ख़ुशी के लिए
लिखती हूँ
मन के सुकून के लिए
लिखती हूँ

दिल की तसल्ली के लिए
लिखती हूँ
रूह के सुकून के लिए
लिखती हूँ

समझने वाले यूं ही
समझ लेते हैं कि
मैं एक रचनाकार
कवि या लेखक हूँ

पर मैं,
वास्तव में अपनी
मां की छवि हूँ
कलम से खेलती हूँ
और जो मन में आए
बेझिझक पन्नों पर उतार देती हूँ।।
-ममता तिवारी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
32 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर