कितनी सुबहें,कितनी शामें,कितनी रातें छोड़ आएं हैं,
हम एक दहलीज़ पर बचपन की शरारतें छोड़ आएं हैं।
अक्सर सुनकर जिनको ख़ुद को पा लिया करते थे,वो,
दादी-नानी के क़िस्से दुलार की बरसातें छोड़ आएं हैं।
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