ऐ ज़िंदगी लम्हा-लम्हा तुझे हॅ॑साने में,
कितने ऑ॑सू पिएं ऑ॑ख ने ज़माने में।
तेरी ख़्वाहिशें तो ख़त्म ही नहीं होती,
उम्र गुज़री मेरी दिल तुझे समझाने में।
ये ख़ामोशी,सिसकियाॅ॑,खालीपन,तन्हाई,
क्या कुछ नहीं पाया मैंने तुमको पाने में।
बेकली,दर्द,तड़प,रुसवाई ए इश्क़ बता,
और क्या-क्या छुपा है तेरे ख़ज़ाने में।
बरसों जिसने जीने दिया न मरने दिया,
ग़म वो लगा ढ़लने लफ़्ज़ों के पैमाने में।
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