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एक सोच

                
                                                         
                            कुछ लिखने से पहले लगता हैं कुछ सोचूं
                                                                 
                            
पर क्या ,
दरिंदों की करतूतें मालूम होने पर
मन करता है उनका मुंह नोचू ।

समाज मे सीना तान कर रहते हैं
ये दरिंदे ,
ऐसी सोच के कारण ही नहीं दिखते हैं
परिंदे ।

लड़कियों के पैरों मे लगा दी जाती है बेड़ियां ,
क्या अब समाज मे सिर उठाकर भी नहीं रह,
सकती हैं हमारी छोरियां।

आखिर कब तक एक लड़की को ,
लड़की होने की सजा मिलेगी,
न जाने कब ये सोच बदलेगी ।

न जाने कब से घात लगाए,
बैठे हैं ये दरिंदे,
ऐसी सोच के कारण ही,
नही दिखते हैं परिंदे।
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2 वर्ष पहले

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