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स्त्री

                
                                                         
                            हे सखि ! तुम जो यह आईना देखकर इतराती हो...
                                                                 
                            
आईने में यूं मुस्कुराती हो...

तुमने जो यह मुखौटा पहना है क्या वो सही है ?
दुनिया से तुम नजरें चुराती हो...
अपनी सच्चाई को तुम किससे छुपाती हो?

जरा पूछो उस आईने में ख़ुद से क्यों तुम इस धरती पर आई हो..
पहचान लो खुद को खोने से पहले।
बचा लो उस स्त्री को जो तुम्हारे अंदर है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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