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सर्द ऋतु की बेला आई

                
                                                         
                            सर्द ऋतु की बेला आई
                                                                 
                            
सी सी करती ठिठुरन लाई
चला गुड़ मूँगफली को ब्याहने
गोंद फुदक फुदक कर नाच रहा
तिल गुड़ की बारात में देखो
सूखे मेवे बाँट रहा
सकल उत्तर को दिनकर जी
एक तराजू में टांग रहें
चंदा मामा भी शर्माकर
मुँह दिखलाई मांग रहे
अलाव सुलगते हर चौराहे
हाथ मुँह सब ताप रहे
सूरज दादा अब तो दिखलाओ
खिड़की से सब झाँक रहे
बाजरे और मक्की की रोटी
थोड़ी गर्माहट बाँट रही
साठ बरस की बूढ़ी काकी
ठिठुर ठिठुर के कांप रही
हरी घास पे ओंस की बूंदें
मोती के जैसे चमक रही
कोहरे की इस कड़क मार से
सबकी साँसे अटक रही
कोई दारू तो कही दवा से
जाड़ो के दिन काट रहे
बच्चे से बूढ़े तक सबकी
बतीसी के बाजे बाज रहे।

- (ममता बायला)
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2 वर्ष पहले

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