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यूँ भी कोई जीता है

                
                                                         
                            यूँ ही जीते हैं हम तो क्या है ज़िन्दगी
                                                                 
                            
एक बोझ औऱ कर्ज़ का सामान है जिंदगी

अपनी सोच अपना वजूद कुछ भी तो नहीं
यूँ भी क्या कोई जीता है जिंदगी?

अपना तो ये तन नहीं,मन नहीं ये ज़ान भी नहीं,
क्या क्या खेल दिखती है जिंदगी?

पलभर जिनके साये में सपनो को सजाया था,
उन सब पर खाक बिछाती है जिंदगी।

जिसके लिए सब कुछ लुटाया था कभी,
ले जाता है अब वही उठाकर ये जिंदगी।

- ममता खुराना
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2 वर्ष पहले

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