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हरी भरी वसुंधरा

                
                                                         
                            वसुंधरा पुकारती तुझे उसे तुम संवार दो
                                                                 
                            
फूलों से ताजगी हो कलियों सा निखार हो।
संजो रखी है मैंने अपने में कितनी ही पर्वत की चोटियां
जिन पर बसती है सैकड़ों मंदिरों की घंटियां।
सफल हुई है वहीं पर ऋषि मुनियों की तपस्या
जो जो मैंने तुमको दिया है
तुम ना कर पाओगे उसकी आख्या।
राहों में खड़े हैं तुम्हारी हजारों वृक्ष चिनार और देवदार के
बिछे हुए हैं गलीचे यहां फूलों से बहार के।
दिशा दिशा में बिखर रहा है रंग यहां
कण-कण में छाई हुई है उमंग यहां।
तरह तरह के फल फूलों से लदी हुई है घाटियां
हरी भरी वसुंधरा से सजी हुई है वादियां।
झर झर झरते झरनों और रंग बिरंगे फूलों से
सजाया है सौंदर्य सारा
हरी हरी वसुंधरा का रुप लगता है कितना प्यारा।
कुदरत के इस अप्रतिम सौंदर्य को प्यार से निहार लो
छुपा रखी है मैंने अपने में कितने ही गुणों की खान
इस तथ्य को तुम अपने मन में उतार लो
मुझसे ही सुंदर मधुमास है होता
मुझसे ही मौसम का मिजाज बदलता
इसको नष्ट करके हरी भरी वसुंधरा को ना कष्ट पहुंचाओ तुम पर्यावरण ही तुम्हारी जिंदगी है अपने जीवन को बचाओ तुम।

ममता कनौजिया
कानपुर उत्तर प्रदेश
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2 वर्ष पहले

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