हाँ वो कुछ कहना चाहती थी
अपने शरीर से ज्यादा अपने
मन के घावों के बारे में जिससे
हो गई थी आत्मा छिन्न-भिन्न ।
वो कहना चाहती थी पिता से
"रोओं मत,बेटियां तो होतीं हीं है
एक दिन दूर जाने के लिए"
वो कहना चाहती थी भाई से
"तू न दिखाना ऐसा पुरुषत्व
कभी किसी बहन पर"
वो कहना चाहती थी माँ से
"मैं फिर आऊंगी आँचल में
तेरे,फिर से जनम लेकर"
लेकिन
दिल में घुमङते शब्दों के लियें
जुबान नही थी उसके पास
थी तो बस ऑखे जिसमें
टूटे सपनें लूटी जिन्दगानी धी
आखिर जीवटता हार गई
ख़त्म हो गई जीवन कहानी
केवल स्त्री होने की
इतनी गंभीर सजा?
हाँ वो ये कहना चाहती थी ।
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