मेला सा लगता था कोठी पर उसके
जब तक सितारे बुलंद थे उसके
खचाखच भरा था गलियारा उसका
दुआ और सलामत की लगती थी अर्जी
वक्त ने करवट जब बदला उसी का
अपने पराये की सबक उसने सीखी
दौलत और शोहरत से प्यार था सबको
बिना मतलब के पूछा नहीं किसी ने उसको
क्या दुनिया मतलबी है कहते इसी को
बिना तोहफे के जिंदगी क्या चलती नहीं है
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