ओह डियर दिसम्बर तुम जो आए ...
संग अपने कितनी सर्दी लेकर आए ...
ये मुर्गा भी बेमतलब में शोर मचाए ...
नासमझ जाने सर्दी में जल्दी क्यो जगाए..
सुबह सुबह जब मुर्गा बांग दे जगाए ...
तब सोचे क्या मुर्गे को ठंड न सताए
ठिठुरन से सबके हाथ पैर है कांपे ...
सूरज चाचा है की कही औऱ झांके ...
सूरज चाचा भी नखरे है दिखाता ...
कभी उगता तो कभी छिप जाता ...
फिर क्या हमसे नखरे सहन ना होते..
ओढ़ रजाई अब,हम आराम से सोते
गजक मूंगफली,गाजर का हलवा..
सर्दी में देखो चलता इनका जलवा....
हाथ पैरों की जब कुल्फी जम जाती ...
तब जा कर अलाव की याद है आती ...
सुबह सुबह जाग कर जब भी पड़े नहाना ...
फिर याद आता है मुझे एक नया बहाना ...
इसलिए सर्दी में रोज नही नहाना चाहिए ...
ठंड के चक्कर में पानी भी बचाना चाहिए ...
बस रजाई औऱ चाय सर्दी में आती काम ...
घर पर आराम करें ,ले के प्रभु का नाम ...
-ममता गुप्ता
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