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पर्दे की राखी

                
                                                         
                            मैं छोटा-सा कलकार हूं,भावों की अभिव्यक्ति का।
                                                                 
                            
लिखने की हिम्मत करता हूं, प्रहार यथाशक्ति का।
आंखों ने देखा है जो,उल्लेख उसी का करता हूं।
छल,छद्म व व्यभिचार को देख-देख के मरता हूं।

राखी भेजी कर्णावती ने वह जमाना तुल लगाया।
राखी भेजी राजा बलि को वह जमाना तुल गया।
गली- गली में लिए खड़ी हैं, लच्छे रक्षाबंधन के।
कोयल की बोलीमें कौवा शब्द छोड़ गया क्रंदन के।

भैया- भैया प्यारी बहना, प्रायः वो कुछ बोल गए।
ओझल होते आंखों से वो कच्चा धागा खोल गए।
संक्रमित संस्कार हैं उनमें,दहाड़ दहाड़ के कहता हूं।
घायल अंतर मन है मेरा, चैन उखाड़कर रहता हूं।

पाश्चात्य संस्कृति में मुझको दोष दिखाई देता है।
बच्चे-बच्चे के चेहरे पर कुछ रोष दिखाई देता है।
कहते,चलते और सुनाते समझदार ऊब जाता है।
पश्चिम में जाकर के यारों, सूरज भी डूब जाता है।

पावन धरा का पावन पर्व,भारत में है राखी का।
ज्यों सैनिक का दायित्व सम्मान वर्दी खाकी का।
औचित्य नहीं है उनका, बोझ धरा के दागी का।
पूरा करना पुरखों का जो स्वप्न रह गया बाकी का।

रिश्ता भाई बहन का है, इसे तुम मजबूत करो।
किसने,किसको,क्या कहा है?नहीं तुम सबूत करो।
उठो, जागो, होश में आओ, यह पर्व तुम्हारा है।
समझे नहीं यदि राखी को तो जीवन गर्क तुम्हारा है।
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44 मिनट पहले

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