वोट का अधिकार हमको , शक्ति अनुपम दे गया।
एक उँगली का मसी-कण , भाग्य भारत लिख गया।।
सोचकर ही मत गिराओ , राष्ट्र हित भी ध्यान हो।
'रुद्र' इस अधिकार से ही , देश का उत्थान हो।।१।।
भूलना मत शक्ति अपनी , तुम प्रजा ही भूप हो।
सत्य के पथ पर चलो तुम , क्रांति का ही रूप हो।।
शासकों को भी झुका दे , लोक का यह ज्वार है।
'रुद्र' अब तो जाग जाओ , देेेश की ललकार है।।२।।
जो चुने तुमको सँभाले , देश का अभिमान हो।
स्वार्थ त्यागे लोक सेवा , में सदा ही ध्यान हो।।
त्याग निष्ठा और सेवा , धर्म जिसका मीत हो।
'रुद्र' इस जन-तंत्र में ही , सत्य की बस जीत हो।।३।।
बोलने की छूट सबको , सत्य वाणी गूँजती।
मौन रहकर जो सही नहिं , बात वह है पूछती।।
लेखनी स्वतंत्र होकर , गीत युग के गा रही।
'रुद्र' यह अभिव्यक्ति सुरभि , घर-गली महका रही।।४।।
लोक का यह पर्व पावन , नित्य ही बढ़ता रहे।
सत्य-निष्ठा का विजय-ध्वज , व्योम में उड़ता रहे।।
लोभ -भय में जो न डोले , नागरिक वह श्रेष्ठ है।
'रुद्र' भारत की व्यवस्था , विश्व में ही ज्येष्ठ है।।५।।
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