मौसम
आज मौसम ने भी अपने तेवर बदल लिए,
बदली फिज़ाओं में हम भी रंग भर लिए।
जहाँ कल तक लगा रहता था, खुशियों का मेला,
वहीं आज हर राह पर मिलता है, सन्नाटा अकेला।
हिम-बिंदुओं के श्वेत कण,
बरसा रहे हैं स्वप्निल क्षण।
ओंस की बूँदें मोती बनकर,
सजा रहीं धरती का दर्पण।
धुंध ने ओढ़ी चादर धानी,
खो गई राहों की निशानी।
बादल छाए नभ के आँगन,
सूरज छिपा लिए है दर्पण।
मौसम बदला, रंग बदलते,
सूखे पत्ते संग-संग चलते।
कभी हँसाता, कभी रुलाता,
जीवन के कितने रंग दिखाता।
ऋतु का यह बदला-बदला रूप,
कहीं छाँव तो कहीं खिली धूप।
मौसम चाहे जितना बदल जाए,
मन में अपनी गंध छोड़ जाए।
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