हर आँख में... सुनहरे कल के... सपनों का संसार था...
माँ की दुआएँ... पिता की उम्मीदें...
हर दिल में... एक उजला ख़्वाब था...
जलती दीवारें... पूछ रही हैं...
क्यों लापरवाही इतनी भारी पड़ी...
क्यों सुरक्षा की साँसें... थम-सी गईं...
क्यों ज़िंदगी यूँ हार गई...
ना कोई धर्म... ना कोई जात...
हर माँ की कोख... उजड़ी एक साथ...
आँसू कहते हैं... बस एक बात...
अब ना दोहराए... ऐसा आघात...
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