कभी दूर रहकर देखो,
पता चले कि पास क्या था,
कभी छोड़कर देखो,
पता चले कि क्या पाया था,
कभी छुपकर देखो,
पता चले कि कितने ढूंढने आए थे,
कभी उदासी देखो,
पता चले कि मुस्कान कितनी आसान है होंठों पर,
कभी खोकर देखो,
पता चले कि होने में क्या हो गए थे,
कभी चलकर देखो,
पता चले कि कितनी राहें तुम्हारे कारण बिछड़ गई,
कभी दिल से लग जाओ,
पता चले कि मोहब्बत क्यों तड़पा रही थी,
कभी मुझे देखो,
कि मेरे पास क्या कमी है,
जो कोई लेने में विश्वास रखें।।
- ललित दाधीच
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