आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कभी ऐसा कभी वैसा

                
                                                         
                            कभी दूर रहकर देखो,
                                                                 
                            
पता चले कि पास क्या था,
कभी छोड़कर देखो,
पता चले कि क्या पाया था,
कभी छुपकर देखो,
पता चले कि कितने ढूंढने आए थे,
कभी उदासी देखो,
पता चले कि मुस्कान कितनी आसान है होंठों पर,
कभी खोकर देखो,
पता चले कि होने में क्या हो गए थे,
कभी चलकर देखो,
पता चले कि कितनी राहें तुम्हारे कारण बिछड़ गई,
कभी दिल से लग जाओ,
पता चले कि मोहब्बत क्यों तड़पा रही थी,
कभी मुझे देखो,
कि मेरे पास क्या कमी है,
जो कोई लेने में विश्वास रखें।।

- ललित दाधीच
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर