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अब कोई वादा नहीं

                
                                                         
                            अब कुछ ज्यादा नहीं,
                                                                 
                            
किसी से अब कोई वादा नहीं।
निभ सके जो रिश्ते,
तो निभा लेंगे।
निभ न सके तो ,
हाथ जोड़ विदा लेंगे ।

क्यों जरूरी है,
एक एक धागे को पकड़ना।
जो मिलना न चाहे,
उसे जबरदस्ती जकड़ना।
अब जो मिला है,
उसे ही दिल में सजा लेंगे।
निभ सके जो रिश्ते,
तो निभा लेंगे।

वक्त वक्त की बात है,
कभी किसी का तो
कभी किसी का साथ है।
बदलना तो प्रकृति का नियम है,
इंसान की क्या औकात है।
अब,जो जैसा मिले,
उसे ही दिल में बिठा लेंगे।
निभ सके जो रिश्ते,
तो निभा लेंगे।
निभ न सके तो ,
हाथ जोड़ विदा लेंगे।
-कुमारी प्रियंका
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
17 घंटे पहले

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