क़दम-क़दम पर धोखे हैं,
मिलते लोग अनोखे हैं।
जो ख़ुद को कहते हैं अपना,
वो ही राहें रोके हैं॥
मिलते लोग अनोखे हैं।
माँ की ममता छिनी है मुझसे,
पिता का साया छूट गया।
अब मेरा स्वागत करने को,
गर्म हवा के झोंके हैं॥
मिलते लोग अनोखे हैं।
अपनी-अपनी सोच यहाँ पर,
अपनी-अपनी तृष्णा है।
स्वार्थ सिद्ध करने को सबको,
दिखते मुझमें मौके हैं॥
मिलते लोग अनोखे हैं।
क़दम-क़दम पर धोखे हैं॥
- कुमार सर्वेश
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X