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बनते बिगड़ते रिश्ते

                
                                                         
                            बनते बिगड़ते रिश्ते
                                                                 
                            
कभी देखा है रिश्तों का अचानक टूटना,
मैंने तो देखा है....अपनी आंखों से,
कैसे दरक जाते हैं रिश्ते-
पास पास होते हुए भी अनजाने से,
जैसे एक दूसरे को पहचानते नहीं,
आज न्यायालय में देखा मैंने,
अपनी बारी के इंतज़ार में दोनों खड़े हैं,
दरवाजे के दोनों किनारों पर,
न जाने किस आक्रोश में,
अपने अपने मोबाइल पर,
किसी अपने से बतलाते हुए,
जैसे जतलाना चाह रहे हों,
तू नहीं तो क्या हुआ,
मैं खुश हूँ - तेरे बिना,
दशाब्दियों के रिश्ते,
हम राज हम सफर और एक जान थे जो,
आज अचानक अनजान कैसे हो गये,
न जाने क्यों टूट जाते हैं अटूट बंधन,
या तो आज की परवरिश ऐसी है,
या शिक्षा ऐसी है या संस्कार,
शायद हम पुरानी पीढ़ी ये समझ न सके,
लगता है बदल गया है संसार,
बदल गई हैं पुरानी रिवायतें,
बदल गया है आपस का प्यार,
बदल सी गई हैं परिवारक मान्यताएँ,
बदल गया है घर परिवार.

- कुल भूषण
स्वरचित एवं मौलिक 
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3 वर्ष पहले

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