ठोकरें
अनसुनी सच्चाई का एहसास है ठोकरें
मानव की समझ का परिहास है ठोकरें।1।
मानव के चारों ओर, न कोई भी सगा है
विश्वास का प्रथम क्षण ही खुद दगा है
कोई न अपना, संसार सारा यह पराया है
किन्तु मन भी इसे स्वीकार कहाँ पाया है?
जीवन दर्शन अपनाने का किस्सा है ठोकरें
जो भी कमाया हो, उसका हिस्सा है ठोकरें।2।
किस इंसान ने ये ठोकरें कभी नहीं खाई हैं?
लेकिन दुर्भाग्य यह कि समझ में न आई हैं,
जो रहा सदा ही इन अनुभवों का मारा है
दिखा स्पष्ट जग का प्रपंच उसे ही सारा है।
कटु सत्य को कटुता से ही समझाती हैं ठोकरें
सँजोये स्वप्नों का क्रूर माखौल उड़ातीं हैं ठोकरें।3।
इन ठोकरों में समाहित जीवन पथ सकल है
ईर्ष्या, द्वेष,मात्सर्य और साथ में देखो छल है
बाहर लगे मुखौटों के भीतर की है यह कहानी
यह बात नहीं नई, है कथा दुनिया की पुरानी।
दर्पण दिखाकर दिल भी सदा तोड़तीं हैं ठोकरें
बिना दिखाये तट, मँझधार में छोडतीं हैं ठोकरें।4।
कठोर और बड़ी ही होती ये ठोकरें क्रूर हैं
बार बार मानव को सिद्ध करती मजबूर हैं
सुनना चाहो तो बहुत कुछ ये बोलतीं हैं
किताबी ज्ञान से अधिक आँखें खोलतीं हैं।
देख कर किए अनदेखे को सामने लाती है ठोकरें
पथ पर चलना ही नहीं जीना सिखाती हैं ठोकरें।5।
- क्षितिज जैन
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