आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ठोकरें

                
                                                         
                            ठोकरें
                                                                 
                            
अनसुनी सच्चाई का एहसास है ठोकरें
मानव की समझ का परिहास है ठोकरें।1।
मानव के चारों ओर, न कोई भी सगा है
विश्वास का प्रथम क्षण ही खुद दगा है
कोई न अपना, संसार सारा यह पराया है
किन्तु मन भी इसे स्वीकार कहाँ पाया है?
जीवन दर्शन अपनाने का किस्सा है ठोकरें
जो भी कमाया हो, उसका हिस्सा है ठोकरें।2।
किस इंसान ने ये ठोकरें कभी नहीं खाई हैं?
लेकिन दुर्भाग्य यह कि समझ में न आई हैं,
जो रहा सदा ही इन अनुभवों का मारा है
दिखा स्पष्ट जग का प्रपंच उसे ही सारा है।
कटु सत्य को कटुता से ही समझाती हैं ठोकरें
सँजोये स्वप्नों का क्रूर माखौल उड़ातीं हैं ठोकरें।3।
इन ठोकरों में समाहित जीवन पथ सकल है
ईर्ष्या, द्वेष,मात्सर्य और साथ में देखो छल है
बाहर लगे मुखौटों के भीतर की है यह कहानी
यह बात नहीं नई, है कथा दुनिया की पुरानी।
दर्पण दिखाकर दिल भी सदा तोड़तीं हैं ठोकरें
बिना दिखाये तट, मँझधार में छोडतीं हैं ठोकरें।4।
कठोर और बड़ी ही होती ये ठोकरें क्रूर हैं
बार बार मानव को सिद्ध करती मजबूर हैं
सुनना चाहो तो बहुत कुछ ये बोलतीं हैं
किताबी ज्ञान से अधिक आँखें खोलतीं हैं।
देख कर किए अनदेखे को सामने लाती है ठोकरें
पथ पर चलना ही नहीं जीना सिखाती हैं ठोकरें।5।
- क्षितिज जैन


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर