हर क्षण अपने जीवन के
तू शीश ऐसे ही उठाए रख
लौ समान जगमग करती
आशा की अलख जगाए रख।
तेरे निश्चय और संकल्प का
कभी संभव है अवसान नहीं
उस जली लौ को बुझा सकता
कोई झंझा, कोई तूफान नहीं।
दुर्बलता न आने दे मन में
निज साहस तू बनाए रख।
प्रथम पग आगे रखते ही
प्रीत-स्नेह क्या?संबंध मोह क्या?
संयोग औ' क्षणिक मिलन क्या
दीर्घ बिछुड़न या बिछोह क्या?
बस यही एक बात पुनश्च
अपने को समझाए रख।
जब बिना थके विश्राम किए
संघर्ष पथ पर चलता है
आलोक देता हुआ अग्निपुंज
तेरे भीतर खुद जलता है।
उस अग्निपुंज के आताप को
अपने भीतर समाए रख।
अपने संघर्षों और रणों में
जैसे जैसे तत्पर हो जूझेगा
अभ्युदय का पथ अभीप्सित
तुझे दिखेगा भी और सूझेगा।
आगे आ रहे संग्राम के लिए
संबल अपना जुटाए रख।
-क्षितिज जैन "अनघ"
मोबाइल नंबर- 9636407465
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