दोस्ती का मिलन
बरसों बाद जब दो दोस्त मिले,
तो आँखों में बचपन के मौसम खिले।
न कोई शिकवा, न कोई सवाल,
बस यादों ने फिर खोल दिए अपने जाल।
वो गलियाँ, वो खेल, वो छोटी-सी बात,
वो घंटों की हँसी, वो दिन और वो रात।
समय ने भले ही राहें बदल दीं,
पर दोस्ती की डोर कहाँ कभी कम हुई।
एक ने कहा—“तू अब भी वैसा ही है,”
दूजे ने हँसकर कहा—“तू भी तो वैसा ही है।”
फिर दोनों की आँखें थोड़ी नम हो गईं,
पुरानी यादें जैसे फिर से जवान हो गईं।
मिलना तो बस एक बहाना था,
यादों को फिर से गले लगाना था।
दूरियाँ चाहे कितनी भी मजबूर करें,
सच्चे दोस्त दिल से कभी दूर नहीं होते।
आज फिर दो दोस्त साथ खड़े थे,
जैसे बीते कल के सारे पल सामने पड़े थे।
समय ने बहुत कुछ बदला, मगर एक बात वही रही—
दोस्ती सच्ची हो तो हर मुलाकात,
दिल में हमेशा के लिए याद बनकर रहती है।
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