त्रासदी में शहर का शहर डुब गया
व्यवस्थित कारवां पल में बह गया
जिन्दगी का कोई भरोसा ही नहीं
देखकर ऐसा मंजर हृदय कह गया
आजमाती प्रकृति सब्र को तोड़कर
देखते- देखते न कोई रह गया
बावले हो गए देख भयावह घड़ी
बाढ़ जिगर चीरकर सितम कर गया
जिन्दगी ज़र ज़मी कौन संचित करे
ग्लेशियर गाँव का गाँव ही लील गया
जलप्लावन कीचड़ में धरा आज है
अपना बिछड़ा हुआ न कोई मिल गया
द्रवित देखकर यह हृदय है किरण
प्रकृति क्रोध प्रमाण प्रत्यक्ष दिख गया।
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