आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

"मैंने सुना है"

                
                                                         
                            मैंने सुना है
                                                                 
                            
माँ को कहते हुए, की
लड़कियां अपने घर हाल समझती है
मैंने सुना है..
माँ को कहते हुए की
लड़कियां घर को संजो के चलती है
मैंने सुना है माँ को कहते हुए
जब मैं अपनी मर्जी से निकल जाऊ
घर से कहीं... की वो हो गई है अब
मेरे बस से बहार..
अब नहीं मेरा उसपे कोई अधिकार..
पर
मैंने कभी नहीं सुना उन्हें ये
कहते हुए.. की
लडके घर को संभाल कर रखते है
मैंने कभी नहीं सुना उन्हें
ये कहते हुए की..
लड़के अपनी इच्छाओ को मार के चलते है
मैंने कभी नहीं सुना उन्हें
ये कहते हुए की....
जो लड़कियों का पराया होता है
और लड़को का पीढ़ी दर पीढ़ी तक
अपना...।
वो उस घर के काम का जिम्मा अपने
सर रखते है...
मेंने कभी नहीं सुना..
माँ को ये कहते हुए.. की
लडके हर जगह उन्हें बताकर जाते है
मैंने कभी नहीं सुना उन्हें
ये कहते हुए की....
लडके भी समझौता करने के लिए बने होते है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 hour ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर