काश तुम मेरे होते!
तो आँखें कभी मायूस ना होते,
इस मुखड़े से मुस्कान ना खोते,
काश तुम मेरे होते!
प्रेम है या कुछ और, स्पष्टता नहीं,
तुम्हें नहीं चाहते खोना, खता यहीं।
एक चाह में हृदय अब दहता ही सही,
मिलन आह में उजियारा रखता हैं कहीं।
काश तुम मेरे होते!
तो एक दूसरे को समझते, सहजते, संभालते...
फिर हर मोड़, डगर, पहर इक दूजे में बिखरते।
काश तुम मेरे होते!
हालात बदले तो कभी पाऊं तुम्हें हर सवेरे,
नहीं तो सिर्फ शाम सूर्य अपना तेरे संग ढले।
सिंदूरी आसमान हो हम दोनों पर झुके,
उस आसमान में चांद हो दोनों को झांके।
एक डर है जो इसी दिल में...
पनपता है, ठहरता है, बिखरता है
ऐसे डर के भ्रम में दोनों ना फंसते।
काश तुम मेरे होते!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X