मैं कुछ तो ढूंढ रही हूं...
कुछ तो ढूंढ रही हूं...
क्या ढूंढ रही हूं?
यह मुझे खुद भी नहीं पता,
यह किसी को नहीं पता...
बस, मैं कुछ तो ढूंढ रही हूं।
कांच से इस जल-गर्भ में
मैं किसी अनसुने शब्द की काया तलाशती हूं।
कुछ तो ढूंढ रही हूं मैं,
पर क्या... यह मुझे खुद भी नहीं पता।
इस ठहरे हुए तालाब के सीने पर
बेचैन हाथ फैलाती जा रही हूं,
उंगलियां कुरेदती हैं पानी के सोए हुए रेशे
जहां मैं अपने ही बिखरे बिंब की छाया तलाशती हूं।
पानी की हर परत खंगाल दी मैंने,
गहराइयों को यूं ही टटोलती जा रही हूं।
इधर से उधर, लहर-लहर,
एक अनाम सी तड़प में बहती जा रही हूं।
हर दलदल और मकरंद की साजिश के बीच
कहीं कमल की आहिस्ता खुलती पंखुड़ियों का दंभ है,
हर पत्ती के तल में टटोलती है एक बेनाम तड़प...
क्या यही किसी अंत की आहट, या कोई नवारंभ है?
कुछ तो है जो खो गया है कहीं,
या शायद कभी था ही नहीं...
फिर भी न जाने किस अनजानी आस में
मैं जल को खंगालती जा रही हूं।
मरीचिका सी कांपती हैं जल की परतें,
हर थरथराहट एक खामोश सवाल छोड़ जाती है।
सुलझाने निकलती हूं जो पहेली इस तल में,
मुट्ठी खोलती हूं तो बस शून्य की नमी रह जाती है।
मैं क्या ढूंढ रही हूं?
यह भेद किसी को भी नहीं मालूम।
शायद किसी विसरे हुए युग का कोई अक्स है,
या फिर इस अनंत शांति के सीने में दफन
मेरी ही चेतना का कोई भूला हुआ अंश है।
मैं कुछ तो ढूंढ रही हूं...
क्या ढूंढ रही हूं?
यह मुझे खुद भी नहीं पता,
यह किसी को नहीं पता...
बस, मैं कुछ तो ढूंढ रही हूं।
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