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मैं कहानियों को जीती हूँ...

                
                                                         
                            मैं कहानियों को जीती हूँ...
                                                                 
                            
मैं पन्नों पर लिखी इबारत नहीं.... उनका बहता हुआ लहू हूँ,
मैं कहानियों को सिर्फ़ पढ़ती नहीं.... मैं तो उनमें ही कहीं मौजूद हूँ।
न जाने क्या जादू छुपा है इन कागज़ी सिलवटों में,
मैं हर क़िस्से के साथ अपनी एक नई ज़िंदगी बुनती हूँ...
हाँ, मैं कहानियों को जीती हूँ!
कभी बचपन की उस धीमी दौड़ में.... खुद को कछुआ मानकर सब्र से चलती हूँ,
कभी शेर और चूहे के क़िस्से में..... एक नन्हा सा सहारा बन संभलती हूँ।
कभी अमृता की कलम की स्याही बन.....किसी कोरे कागज़ पर पिघलती हूँ,
तो कभी पारो की बेबस आँखों से, देवदास का बेइंतहा इंतज़ार बनती हूँ,
तो कभी चंद्रमुखी का निस्वार्थ प्यार बनती हूँ।
कभी उमराव जान की ग़ज़ल बन.....अपने ही दर्दों की महफ़िल में सजती हूँ,
कभी मंजुलिका बन अँधेरे कमरों के सन्नाटों में चीख उठती हूँ,
तो कभी अन्ना कारेनिना का टूटा ख़्वाब बन बिखरती हूँ।
कभी सोहनी की बहती नदी का वो कच्चा घड़ा बनकर टूटती हूँ,
कभी हीर का दर्द.... तो कभी रांझे की बांसुरी की तान में उतरती हूँ।
कभी लैला की दीवानगी बन....सहरा की तप्त रेत पर भटकती हूँ,
कभी शीरीं का इश्क़..... तो कभी फ़रहाद का छेदा हुआ पहाड़ बन खड़ी रहती हूँ।
कभी अनारकली बन......मोहब्बत की खातिर ज़िंदा दीवारों में चुन जाती हूँ,
तो कभी नागमती का विरह बन..... हर एक मौसम की आग में सुलगती हूँ।
तो कभी मीरा सी जोगन बन..... हंसकर ज़हर का प्याला पीती हूँ।
कभी सीता बन अग्नि-परीक्षा के दावानल से भी निखरकर गुज़रती हूँ,
कभी शबरी के बेमिसाल सब्र से...... युगों-युगों तक मीठे बेरों की राह सजाती हूँ।
कभी उर्मिला का चौदह बरसों का ख़ामोश त्याग बन जाती हूँ,
तो कभी अहिल्या सा सन्नाटा ओढ़.....पत्थर बन किसी पावन स्पर्श की आस लगाती हूँ।
कभी राधा का अमर और अलौकिक इंतज़ार बनती हूँ,
तो कभी रुक्मिणी सा मौन और पावन समर्पण बन मुस्कुराती हूँ।
कभी द्रौपदी का जाग्रत स्वाभिमान बन.... वक्त की भरी अदालत में सवाल करती हूँ,
कभी गांधारी की आँखों की पट्टी बन..... दुनिया के छल और अधर्म पर चुपचाप रोती हूँ।
कभी कर्ण का एकाकी और वीर संघर्ष बन....अपनी ही बदकिस्मती से जूझती हूँ,
तो कभी अभिमन्यु बन.....नियति के कठिन चक्रव्यूह में बेबाक उतर जाती हूँ।
कभी एकलव्य की अटूट निष्ठा बन.....हंसकर अपना अंगूठा भी समर्पित कर आती हूँ।
इन महागाथाओं ने.... इन दास्तानों ने मुझे वक्त से पहले ही बड़ा कर दिया,
दुनिया के हर एक जज़्बात...... हर एक एहसास, हर एक ज़ख्म से रूबरू करा दिया।
सूनेपन और खालीपन के लिए शायद मेरी रूह बनी ही नहीं थी कभी,
इन्हीं क़िस्सों ने मुझे हर एक सांस को पूरी शिद्दत से महसूस करना सिखा दिया।
मैं हर रात एक नया किरदार ओढ़कर सुकून से सोती हूँ,
मैं इस फ़ानी जहाँ में होकर भी.....पन्नों की अमर दुनिया में खोई रहती हूँ।
मैं कहानियों को जीती हूँ...
हाँ, मैं कहानियों को जीती हूँ!

 
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2 घंटे पहले

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