अगर मैं चांद लिखूं
तो उससे पहले उसकी स्याह मिट्टी को लिखूंगी...
अगर मैं सितारे भी लिखने जाऊं तो शायद उनके अंदर थमे अंधेरे को लिखूंगी।
जो मैं लिख दूं अगर सूरज को तो उसकी आग से पहले
उसी में छुपी शीतलता लिखूंगी।
अगर आकाश को लिखूंगी तो पहले उसमें उड़ते बेफिक्र पंछी लिखूंगी।
मैं फूलों को लिखने से पहले जिस डाली पर वो शान से झूम रहे हैं
उस डाली का अपना दर्द और बोझ लिखूंगी।
तितली को नहीं मैं तो मधुमक्खी के पंखों को लिखूंगी।
अगर मैं पानी लिखूं तो समंदर या नदी नहीं लिखूंगी,
मैं तो मेरा प्यारा आशियाना अपना प्यारा सा तालाब लिखूंगी।
फूलों में सबसे खास गुलाब नहीं है,
मैं तो कमल की पंखुड़ियों को लिखूंगी।
अगर मैं किसी वृक्ष की ठंडी छांव को लिखूंगी,
तो पहले धूप में तपने उसके तने और उनकी गहरी जड़ों को लिखूंगी।
मैं किसी ताज की चमक को लिखने से पहले,
उसकी बुनियाद में दफ़्न हर एक ईंट के सब्र को लिखूंगी।
जो मैं लिखने जाऊं किसी सुबह की पहली किरण को,
तो उससे पहले रात के आखिरी अंधेरे का लंबा इंतजार लिखूंगी।
अगर मैं बारिश की बूंदों का शोर लिखूंगी,
तो पहले तपते हुए बादलों का भारीपन और उनकी जलन लिखूंगी।
जो मैं लिखने जाऊं बसंत के खिलने का जश्न,
तो पहले पतझड़ में चुपचाप बिखर गए पत्तों का त्याग लिखूंगी।
मैं किसी शायर के लफ़्ज़ों की वाह-वाह से पहले,
उसके सीने में दबी, तड़पती हुई अनकही खामोशी को लिखूंगी।
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