काल की तीव्र ये चाल
देखो बड़ी विकराल
समय कुछ भीतर
कभी लगता समांतर
बिछ रहा इक जाल
खड़ा सम्मुख काल
शून्य उद्भासित भाल
लाया प्रचंड भूचाल
मानव भक्षी मानव
मानव बना दानव
अनंत भोग विलास
बनता काल ग्रास
बिखरे कितने प्राण
जीवन चाहे त्राण
नयन बने अंगार
नेह विहीन संसार
रक्त चरित्र अपार
सूक्ष्म अनंत प्रहार
तिमिर में एक मशाल
गहन आस विशाल
बरसती अग्नि प्रचंड
साहस हिम्मत अखंड
अंतस उपजे विश्वास
प्रखर भोर उजास
जाग मानव तू जाग
सत्य से न कभी भाग
जीवन तो ले सँवार
उठा सत्य महीभार
बदले रूप संसार
नव जीवन आधार
क्षण भर को संभाल
पराजित होता काल
पीड़ा,दुख,उपहास
करता जग परिहास
नेह,सप्रेम विहीन
सूक्ष्म प्रकाश महीन
सुख समृद्धि आस
भीतर नया विश्वास
थमता कुछ विलाप
द्वंद,दर्द अभिशाप।।
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