आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पराजित होता काल

                
                                                         
                            काल की तीव्र ये चाल
                                                                 
                            
देखो बड़ी विकराल
समय कुछ भीतर
कभी लगता समांतर

बिछ रहा इक जाल
खड़ा सम्मुख काल
शून्य उद्भासित भाल
लाया प्रचंड भूचाल

मानव भक्षी मानव
मानव बना दानव
अनंत भोग विलास
बनता काल ग्रास

बिखरे कितने प्राण
जीवन चाहे त्राण
नयन बने अंगार
नेह विहीन संसार

रक्त चरित्र अपार
सूक्ष्म अनंत प्रहार
तिमिर में एक मशाल
गहन आस विशाल

बरसती अग्नि प्रचंड
साहस हिम्मत अखंड
अंतस उपजे विश्वास
प्रखर भोर उजास

जाग मानव तू जाग
सत्य से न कभी भाग
जीवन तो ले सँवार
उठा सत्य महीभार

बदले रूप संसार
नव जीवन आधार
क्षण भर को संभाल
पराजित होता काल

पीड़ा,दुख,उपहास
करता जग परिहास
नेह,सप्रेम विहीन
सूक्ष्म प्रकाश महीन

सुख समृद्धि आस
भीतर नया विश्वास
थमता कुछ विलाप
द्वंद,दर्द अभिशाप।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर