वह पहुँची चकिया
किसी ने विश्वास न किया
कि वह तुरंत जायेगी खुल
पर थोड़ी देर रही कूल
फिर गई ढुल।
फिर रुकी
किसी सुंदरी के आगे झुकी।
फिर ढुलकी
हवा से फुसफुसाती हुई
आहिस्ता आहिस्ता
पकड़ी रही रास्ता
जहाँ हाथी दहा था कभी
उसी जगह से हुआ वास्ता।
फिर मुड़ी
और तेजी से उड़ी
पहुँची मोकाम पर
मगर यह अंतिम मोकाम नहीं था।
यहाँ ठहराव था
जिसका इंतज़ार होता था
आज उसी का अभाव था।
सात सोलह का इंतजार
आज यही हुई स्वीकार।
सबलोग यथावत थे
अपनी जगह पर डटे हुए
कोई हलचल नहीं
सब खामोश, किंतु खुश
पर संदेह में घिरे हुए।
बारिश रुकी, बाढ़ आया
फिर रवाना
बख्तियार का लूटना बाकी था
याद आए खुसरो
फिर रुके
फतवा जारी
साहिब से है मिलन जरूरी
मेल हुआ,
अब सफ़र समापन
घर चलिए सब आपन आपन।
फिर मिलेंगे कुछ घंटों में
यूँ ही सफ़र रहेगा जारी
क्यों समझें जीवन को भारी ?
- हरि शंकर कुमार
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