मैं बहुत अकेला हूँ,
चलो, औरों से मिलें।
एक अकेलापन मिला,
जो भीड़ में भी चुप था,
ईश्वर के सामने भी मौन,
आत्मा का अकेलापन।
एक मिला,
जिसके आदर्श ऊँचे थे,
इसलिए उसके साथ चलने वाले कम थे,
विचारों का अकेलापन।
एक दरवाज़े पर खड़ा था,
अपनों से दूर,
किसी प्रिय की दूरी को हर साँस में जीता हुआ,
विरह का अकेलापन।
एक घर में था,
बच्चे थे कभी,
अब उनकी तस्वीरें थीं,
बिछड़ते बचपन का अकेलापन।
एक ने कहा,“मैं झुका नहीं,
इसलिए बहुत लोग छूट गए।”
वह था,
आत्मसम्मान का अकेलापन।
एक और मिला,
जिसने हमेशा सत्य का साथ दिया,
सच की राह में,
छूटते कारवाँ का अकेलापन।
फिर सबसे अजीब
एक मेरे सामने खड़ा था,
दुनिया उसे जानती थी,सराहती थी,
उसकी हर बात पर मुहर लगाती थी,
पर वह स्वयं से डरता था।
दुनिया की स्वीकृति थी,
पर अपनी स्वीकृति नहीं,
वह मैं था।
मैंने पूछा,“तुम कौन हो?”
उसने कहा,
“मैं वह हूँ जो सबके बीच होकर भी
अपने भीतर अकेला है।”
मैंने सब अकेलेपन को देखा
शायद अकेलेपन,
अकेले रहने का नाम नहीं,
अकेलेपन को समझने वाला कोई न मिलना है।
मैं देर तक उन सबको देखता रहा,
आत्मा को,
विचारों को,
विरह को,
बिछड़ते बचपन को,
आत्मसम्मान को,
सच की कीमत को,
और फिर अपने भीतर उतरकर,
अपने ही सामने खड़ा हो गया।
तब लगा,
शायद मैं किसी एक अकेलेपन का नाम नहीं हूँ,
मैं उन सबका थोड़ा-थोड़ा हूँ।
मैं शायद वह अकेलापन हूँ,
जो हर बार किसी और के अकेलेपन में,
अपना चेहरा खोजता है,
और हर मुलाक़ात के बाद थोड़ा कम अकेला,
और थोड़ा अधिक स्वयं हो जाता है।
अकेलापन शायद यह नहीं,
कि कोई हमारे साथ नहीं है,
अकेलापन तो यह है,
कि हम स्वयं के साथ होना भूल गए हैं।
- करुणा ताडेपल्ली
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