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अंतर्द्वंद ( खुद से जंग )

                
                                                         
                            मैं शांत नहीं रह पाता हूं,
                                                                 
                            
एकांत नहीं रह पाता हूं,
मैं खुद ही खुद पर हावी हूं,
मैं खुद ही खुद को खाता हूं...

इस कश्मकश के साए में,
रोज ही टुट बिखरता हूं,
एक जंग है जो भीतर जारी,
मैं खुद ही खुद से लड़ता हूं...

यह गुस्सा कैसा भीतर है?
जो राख मुझे ही करता है,
दिखता हूं जिंदा बाहर से,
पर अंदर कोई मरता है....

सलाखें है यह ख्यालों की,
और खुद ही मैं जल्लाद भी हूं,
जो खुद को रोज सजा देता,
मैं वो बेबस फरियाद भी हूं.....

एक दबी चीख है सीने में,
होठों तक आना पाती है,
ये मेरी खुद की आवाजें
चिल्ला-चिल्लाकर मुझे डराती है...

फिर भी एक उम्मीद छुपाकर,
रोज नया दिन बुनता हूं,
इस शोर शराबे में रुककर,
मैं मन की धड़कन सुनता हूं....।
                                         
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7 घंटे पहले

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