एक साथ सब रंगों का वह सार तिरंगा है आज़ादी
लिखी कभी कलम से थी उन दीवानों ने, देखो वो है आज़ादी
लाठियां के जोर कुछ कमजोर कर गए वो, फौलाद है देखो आज़ादी
उन से हम कुछ सीख गए, उन में ही हम कुछ बीत गए
बीती हुई आहुति की राख हो लिए, खड़ा है आज़ादी
दिनों बाद एक गूँज, जो नई सी गूंजी, है वो आज़ादी
जैसे वह लाल स्याही से मौत लिखी थी वह आज़ादी
एक राह कदम सा बढ़ाकर, जब मन में कुछ रह जाये
रुकी हुई उन आवाजों को सुनने वाला हर शख्स है देखो आज़ादी
तुम गर ना हो यहां खड़े, मन का जज्बा है आज़ादी
मौजों से बचाकर किनारे करती हर वो नाव है देखो आज़ादी
रास्तों के पत्थरों को तरसते बेताब वो इबादत सी
ऐसी नई जज्बातों वाली हर जान-ए-जश्न है आज़ादी
दमन को देखने का अंदाज-ए- गैर अगर, है वह आज़ादी
शहीदों का जैसे आखिरी वह दाॅव है देखो आज़ादी
उन्होंने कहा था ये आकाश ये धरती है एक ही
बांटने वालों को खंडित करती हर वह आवाज है देखो आज़ादी
मौल नहीं तौल नहीं है बस ऐसी बेश कीमती आज़ादी
फिर दौर-ए-समुद्र की छलांगे-शौहरत हैं आज़ादी
पाया है तो संभालना जरा हिसाब से तू
कि कोई टूटी तकदीरों से ताबीर बनाई है आज़ादी
आ! ले जो ले जाएगा तू, आऑसमा से परे है आज़ादी
कर्म सोच के सीमित दायरे से पार खड़ी है आज़ादी
फिर आज को जो आने वाले कल से दूर करे
धर्म रंगभेद बतला कर आमजन को दूर करे, यह ठोर नहीं है आज़ादी
अहंकार का दायरा कुछ और बड़ा, कि हमने रची है आज़ादी
गौरवान्वित इतिहास के पल्लवित मूल्य का तू तौल बड़ा, कि हमने चखी है आज़ादी
संस्कृति प्रकृति, गीला सा वह इंद्रधनुष्य आसमान
एक साथ सब रंगों का वह सार तिरंगा है आज़ादी !!
वह सार तिरंगा है आज़ादी!!
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