आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मक्कारों को जूते की नोंक पर रखता हूं मैं

                
                                                         
                            मौत का खौफ़ नहीं रखता हूं मैं
                                                                 
                            
कफ़न साथ में रखता हूं मैं
यारों से यारी निभाता हूं मैं
मक्कारों को जूते की नोंक पर रखता हूं मैं
रुख तूफानों का मोड़ देता हूं मैं
नींद दुश्मनों की उड़ा देता हूं
शेर-ए-जिगर रखता हूं मैं
मौत का ख़ौफ़ नहीं रखता हूं मैं
कफ़न साथ में रखता हूं मैं... !!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
32 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर