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आशियाने

                
                                                         
                            दरिया का पानी तो उतर गया,
                                                                 
                            
आँखों का पानी बरकरार है।
बह गए जो आशियाने हवाओं में,
उनका मलबा अब भी बेशुमार है।

दरिया उतर गया है मगर,
ज़िंदगी अब भी किनारे पर है।
इन आँखों की नज़र आज भी,
उन टूटे हुए वीराने पर है।
—कमल किशोर झा 
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4 घंटे पहले

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