मेरी आह मेरी दुहाई ग़ज़ल है,
मेरी ज़िंदगी की कमाई ग़ज़ल है।
ज़माने के ज़ुल्म-ओ-सितम ने जो घेरा,
तभी मेरे लब पे ये आई ग़ज़ल है।
तेरे हिज्र में जो तड़पता रहा हूँ,
मेरे उस दर्द की दवाई ग़ज़ल है।
अंधेरों ने जब मुझ पे डाला है पहरा,
तभी रोशनी में नहाई ग़ज़ल है।
तेरी जुस्तजू में जहाँ तक मैं पहुँचा,
वहाँ तक ही साए सी छाई ग़ज़ल है।
हो जैसे इबादत की पाकीज़ा रंगत,
मेरे दिल में कुछ यूँ समाई ग़ज़ल है।
क्यों हैरान हो तुम ग़ज़ल मेरी सुनके,
तुम्हीं ने मुझे ये सिखाई ग़ज़ल है।
हो ख़ामोश तुम ए मेरी जान अबतक
तुम्हें इतनी प्यारी सुनाई ग़ज़ल है
न फीका पड़े तेरा मयार, जानाँ,
'कमाल' आज ऐसी सजाई ग़ज़ल है।
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