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हौसला कैसा भी हो, मुकम्मल हर ख़्वाब होगा

                
                                                         
                            ख्वाब कुछ भी हों, मुकम्मल ज़रूर होंगे
                                                                 
                            
अल्फ़ाज़ कुछ भी हों, मशहूर ज़रूर होंगे।
दिन कैसे भी हों, दास्तां ज़रूर होगी,
आफ़तें कैसी भी हों, रोशनी ज़रूर होगी।
मुश्किलें कैसी भी हों, कश्ती पार ज़रूर होगी,
मुकाम कैसा भी हो, सच्चाई की ही जीत होगी।
हम कैसे भी हों, इतिहास में कहानी ज़रूर होगी,
हम नहीं होंगे तो दुनिया में कोई हमसा ज़रूर होगा।
रास्ते कैसे भी हों, कदम आगे ज़रूर बढ़ेंगे,
मंज़िलें कैसी भी हों, रास्ते उनसे ज़रूर मिलेंगे।
रातें कैसी भी हों, सवेरा ज़रूर होगा,
अंधेरे कितने भी हों, उजाला ज़रूर होगा।
दौर कैसा भी हो, वक़्त हमारा ज़रूर आएगा,
तूफान कैसा भी हो, साहिल पुकारेगा ज़रूर।
सफ़र कैसा भी हो, मुसाफ़िर अपनी मंज़िल पाएगा,
हौसला कैसा भी हो, मुकम्मल हर ख़्वाब होगा।
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47 मिनट पहले

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