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महिला दिवस

                
                                                         
                            युग - युग से अग्नि परीक्षा देती,
                                                                 
                            
शक्ति स्वरूपा नारी मैं ही हूं ।
जगत - जननी के पद पर आसीन,
सृष्टि चक्र की धुरी मैं ही हूं ।
अहम् - दम्भ - पाखण्ड की विनाशिनी,
सती - स्वरूपा बेटी मैं ही हूं ।
सहभागिनी अर्धनारीश्वर की,
मर्यादा निभाती सीता मैं ही हूं ।
पति को उन्नत जीवन देने वाली,
कालचक्र घुमाती सावित्री मैं ही हूं ।
आर्याव्रत का नाम बदल भारत,
भरत की माँ शकुन्तला मैं ही हूं ।
इतिहास को पल में बदलने वाली,
रजिया - सुल्ताना मैं ही हूं ।
वीरता का लोहा मनवाने वाली,
झांसी की रानी ' मनु ' मैं ही हूं ।
सेवाभाव का उदाहरण रखने वाली,
मैडम क्यूरी, मदर टेरेसा मैं ही हूं ।
भाषा और स्वर - गान की कोकिला,
सरोजिनी नायडू, लता मंगेशकर हूं ।
कवियों की कल्पना में विद्यमान,
रूपमती - पद्मावती मैं ही हूं ।
दे सको यदि सम्मान मुझे ,
हर क्षेत्र में समकक्षता की हकदार मैं हूं ।
काम के बोझ व दहेज की कुरीतियों से,
स्वयं को उबारती मूर्तिकार मैं ही हूं ।
पुरषों के आंकलन से सिकुड़ती,
प्रतिभा की रफ़्तार मैं ही हूं ।
महिला दिवस पर ही क्यूँ सम्मान,
मैं नित - प्रतिदिन की रानी हूं ।
कुप्रथाओं का अंत होगा जब,
उस जीत की हुंकार मैं ही हूं ।
झूठी हँसी बनेगी जब असली मुस्कान,
उस दिशा की दिशाकार मैं ही हूं ।
वास्तविकता में जब निखरेगा नारी का अस्तित्व,
उसकी पदचाप को सुनने की कर्णधार मैं ही हूं ।

- कल्पना श्रीवास्तव
 "मीना"
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4 वर्ष पहले

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