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काश मैं उड़ पाती

                
                                                         
                            काश मैं उड़ पाती, तो आसमान लिखती,
                                                                 
                            
अपने हर ख़्वाब की नई दास्तान लिखती।

बंदिशों की दीवारें राह रोकती रहीं,
मैं उन्हीं दीवारों पर अपनी उड़ान लिखती।

लोग कहते रहे -"तू लड़की है,ठहर जा,"
मैं अपने हौसलों से नया विधान लिखती।

जिसने समझा मुझे सिर्फ़ घर की चारदीवारी,
उसकी सोच के आगे मैं अपनी पहचान लिखती।

टूटकर भी बिखरती नहीं मैं राहों में,
हर शिकस्त के बाद फिर से अरमान लिखती।

मेरे पंखों को अगर थोड़ा सा आसमान मिलता,
मैं हवाओं के नाम अपनी उड़ान लिखती।

काश कोई समझता आंखों के ख़्वाबों को,
मैं ख़ामोश लबों से पूरा बयान लिखती।

मैं किसी की परछाईं बनकर नहीं जीती,
काश मैं उड़ पाती -तो अपना जहान लिखती।

- काजोल उइके
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2 महीने पहले

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