गिरा हूं तो उठने का हुनर बाकी है,
मेरी आंख में जीत का असर बाकी है।
हवाओं ने लाखों दिए हैं झरोखे,
मगर दिल में जलता शजर बाकी है।
अंधेरों ने रोका, थकाया बहुत है,
मगर राह में एक सहर बाकी है।
जो खोया, उसे सोचकर क्या मिलेगा,
नई ज़िंदगी का सफ़र बाकी है।
न मानूंगा हार मैं हालात से अब,
मेरे हौसलों में भी ज़हर बाकी है।
समय ने भले छीन लीं कुछ खुशी भी,
मगर मुस्कुराने का हुनर बाकी है।
जो कहते हैं किस्मत में कुछ भी नहीं है,
उन्हें क्या पता -मेरा जज़्बा अभी बाकी है।
मैं मंजिल को छू लूंगा एक दिन जरूर,
अभी मेरे हौसलों में जान बाकी है।
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