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बूंद बन के गिरा था !

                
                                                         
                            बूंद बन के गिरा था
                                                                 
                            
सागर में मिल के सागर हो गया,
सागर से ऊपर उठा तो
बादल में मिल के बादल हो गया।

ऊंचाइयों में बह चला
हवाओं संग झूम चला
नील गगन को चूमने
हल्का होकर उड़ चला
पर्वतों के आंचल में
मुलायम मखमली हरियाली पे
सूरज की किरणों से
मोती सा चमकने लगा,
बूंद बन के गिरा था
सागर में मिल के सागर हो गया

बूंद फिर से गिरने लगी
धरती की प्यास बुझाने को
नदियों में फिर बहने लगी
जीवन के गीत सुनाने को
कहीं बर्फ बन जमने लगी
बूंद चोटियों पर ठहरने लगी
कहीं सरिता में बह चली
माटी में घर कर गयी,
बूंद बनके गिरा था
सागर में मिल के सागर हो गया

धरती ने अपनाया, गले लगाया
फिर जीवन को सजाया
बीजों को अंकुर दिया,
हरियाली का श्रृंगार किया
फिर उठी, फिर बरसी
सिलसिला यूं ही चलता रहा
बूंद से सागर बनने का
दिव्य उपक्रम हैरान करता रहा,
बूंद बन के गिरा था
सागर में मिल के सागर हो गया
सागर से ऊपर उठा तो
बादल में मिल के बादल हो गया


 
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एक वर्ष पहले

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