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किताब-ए-इल्म

                
                                                         
                            किताब-ए-इल्म पढ़कर भी बेख़बर हूँ मैं
                                                                 
                            
हुनर-ए-फ़िक्र रखकर भी बे-असर हूँ मैं
बहुत देखा है मैंने शम्स-ए-इकरार पुरनूर
मगर वहम में डूबा हुआ दर-बदर हूँ मैं
रूबरू होकर भी साया-ए-फ़ानी के पीछे
अजब तकरार है, ख़ुद से ही मुंतज़र हूँ मैं
लज़्ज़त-ए-हिस्स ने डाली है हब्स-ए-अज़ब
खयाल गलपाश के क़ब्ज़े में बे-सहर हूँ मैं
हुनर-ए-इल्म बहुत है, तोहिद नहीं है मगर
इसीलिए अपने ही ठान में दर-बदर हूँ मैं
समझा जिन्हें रफ़ीक़-ए-सफ़र-ए-रूह था मैंने
वो सब थे ख़्वाब-ए-नफ़्स, उनका असर हूँ मैं
हर जाबहस के तले एक आग छुपी बैठी
उसी आग का जलता हुआ शजर हूँ मैं
कहे है राह-ए-इनकान में अजब अश्क हू में
तगाफुल ख़ुद ये फ़ना करे, वही मुक़द्दर हूँ मैं

- जुगल किशोर शर्मा, बीकानेर 
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7 महीने पहले

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