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तन्हा ताब

                
                                                         
                            वाक़िफ़ थे दर्द-ए-इश्क़ से हम,
                                                                 
                            
फिर भी जाँ को सोज़ लगा बैठे।

जिसने तदबीर बनाई मेरे क़त्ल की,
ज़र्फ़ देखो, उसी क़ातिल से दिल लगा बैठे।

मयख़ाने में साक़ी से तिश्नगी बुझ न सकी,
उठ के हम वहाँ से दरिया किनारे जा बैठे।

मुब्हम हो गईं उसकी सारी यादें अब,
दिल को तस्कीन है, उसको भुला बैठे।

इन रक़्स करती हवाओं से कहना, 'ताब',
तन्हा हूँ मैं, दो पल को पास आ बैठे।

— हाशिम 'ताब'
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6 घंटे पहले

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