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जिंदगी है ये ढूंढ़ना तो पड़ेगा

                
                                                         
                            भूखे हो तो खाना ढूंढोगे,
                                                                 
                            
प्यासे हो तो पानी ढूंढोगे,
सोना हो तो बिस्तर ढूंढोगे,
जागना हो तो लक्ष्य ढूंढोगे।

सुखी हो तो समय ढूंढोगे,
दुखी हो तो शांति ढूंढोगे,
रोगी हो तो अस्पताल ढूंढोगे,
मर्नासन में हो तो भगवान ढूंढोगे।

व्यापारी हो तो ग्राहक ढूंढोगे,
पद चाइए तो नौकरी ढूंढोगे,
शासक हो तो वोट ढूंढोगे,
जनता हो तो नेता ढूंढोगे।

अमीर हो तो नौकर ढूंढोगे,
गरीब हो तो रोकड ढूंढोगे,
उच्च वर्ग हो तो शोषण ढूंढोगे,
मध्यम वर्ग हो तो धैर्य ढूंढोगे।

सशक्त हो तो निर्बल ढूंढोगे,
निर्बल हो तो सज्जन ढूंढोगे,
कर्मशील हो तो कर्म ढूंढोगे,
व्याभिचारी हो तो व्यसन ढूंढोगे।

अशांत हो तो मंदिर ढूंढोगे,
शांत हो तो सेवा ढूंढोगे,
उदार हो तो जरूरतमंद ढूंढोगे,
कंजूस हो तो संयम ढूंढोगे।

रिशेतदार हो तो कमियां ढूंढोगे,
वफादार हो तो प्रशंसा ढूंढोगे,
समझदार हों तो बेवकूफ ढूंढोगे,
खुद्दार हो तो सम्मान ढूंढोगे।

आंसू आए तो कंधा ढूंढोगे,
अकेले हो तो बंदा ढूंढोगे,
संग्रहणकर्ता हो तो चंदा ढूंढोगे,
हरिद्वार गए हो तो गंगा ढूंढोगे,

दोस्त चाहिए तो सखा ढूंढोगे,
लाचार हो तो बेसाखी ढूंढोगे,
किसान हो तो बारिश ढूंढोगे,
जवान हो तो देशभक्ति ढूंढोगे।

जिंदगी है ये, ढूंढना तो पड़ेगा।
लेखक : जितेंद्र ओडवानी चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

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