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सच का जो हाल है लेकिन न वो देखा जाता

                
                                                         
                            बाज़ के डर से आसमां नहीं छोड़ा जाता
                                                                 
                            
पार जाने का रास्ता कोई ढूँढा जाता

हर समय आप बही ले के बैठ जायेंगे
ज़िन्दगी में नफ़ा - नुकसान तो होता जाता

दोस्तों, दुश्मनों, अपनों का हो कि ग़ैरों का
वो किसी का हो भरोसा नहीं तोड़ा जाता

पितृसत्ता की गर्त से वो मगर कब निकली
एक औरत को बार -बार दबाया जाता

चार दिन के लिए बच्चों का बचपना होता
पुस्तकें दे के खिलौना नहीं छीना जाता

दर्द क्या आपके दिल में नहीं होता होगा
जब हरा पेड़ कोई सामने काटा जाता

सच की तारीफ़ तो झूठे भी लोग करते हैं
सच का जो हाल है लेकिन न वो देखा जाता
- डी एम मिश्र
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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