"शब्दों की चाबी"
भरोसा करो, पर किसी के भरोसे मत रहना,
अपने पैरों पर सीखो तुम तो चलना।
दुनिया भावों से नहीं, संख्या से चलती है,
कितनी आमदनी, कितनी पहुँच पलती है।
कितना बड़ा पद, यही पहचान रह गई,
इंसान की कीमत संख्या में बह गई।
खुद खड़े न हुए तो उम्र भर यूँ होगा,
दूसरों के फैसले पर ही जीवन होगा।
सलाह तो देंगे सभी, ज्ञान लुटाएंगे,
गिरते ही देखो, सबसे पहले हट जाएंगे।
इसलिए अच्छा ढूंढो मत, अच्छे बन जाओ,
तुमसे मिलकर किसी की तलाश बन जाओ।
चार जगहें कभी भी भरती नहीं हैं,
सीमा उनकी कभी भी मरती नहीं हैं।
समुद्र भरे न, श्मशान भरे न,
तृष्णा का गड्ढा, मन भी भरे न।
सब सुख की चाबी को ढूंढ रहे हैं,
पर ताला किसने लगाया, भूल रहे हैं।
सुख पर ताला हमने खुद लगाया है,
खुद ही चाबी को कहीं छुपाया है।
जीवन का सबसे सरल नियम यही है,
जो खुद को दुख दे, वो कर्म नहीं है।
जो अपने साथ न हो, वो औरों से न करना,
यही तो है जीवन को सच्चा पढ़ना।
कोई हकीकत में परेशान पड़ा है,
कोई हकीकत से ही डर कर खड़ा है।
छोटी-छोटी बातें दिल में मत रखना,
वरना बड़े रिश्ते यूँ ही टूटते हैं, ये समझना।
खूबसूरत हैं वो लोग इस जहाँ में,
जो वक्त पर वक्त देते, साथ निभाते हैं।
और कुछ लोग हैं अजब से यहाँ पर,
तुमसे सीख के तुम्हें ही सिखाते हैं।
हद से ज्यादा सहना भी ठीक नहीं,
ज्यादा सहोगे तो कायर ही कहलाओगे कहीं।
साथ निभाने वाले हालात नहीं देखते,
हालात देखने वाले साथ नहीं देते।
नए रिश्ते बनाओ, ये तो अच्छी बात है,
पर पुरानों को निभाना भी तो जज़्बात है।
नयों की चमक में पुरानों को न भूलना,
जड़ों को सींचना, फूलों से ही न फूलना।
शब्द तो देखो चाबियों जैसे होते हैं,
सही लगे तो दिल के ताले खोलते हैं।
गलत लगे तो सच को भी चुभते हैं,
सही शब्द ही मुंह भी बंद करते हैं।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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