अचानक कुछ भी नहीं होता,
अंगूर भी एक दिन में नहीं पकते।
पहले कली खिलती है,
फिर धूप लगती है,
फिर जाकर रस उतरता है।
प्रेम भी ऐसा ही होता है,
पहली नजर बीज बो देती है,
पर वृक्ष बनने में बरसातें लगती हैं।
मन की यात्रा देह तक नहीं जाती सीधे,
पहले दिल से जुबान तक आती है,
फिर जुबान से व्यवहार में ढलती है,
और तब देह भी पवित्र हो जाती है।
इस बीच रास्ते में मिलते हैं पड़ाव,
कभी श्रृंगार हंस देता है,
कभी हास्य ठहाका मारता है,
कभी अद्भुत चकित कर जाता है,
और कभी शांत... बस शांत रह जाता है।
हर रस झरता है,
रिश्ते की मिट्टी में घुलता है,
और जो कड़वा था उसे मधुर बना देता है।
इसलिए उतावले मत हो,
फल तो पकेंगे ही,
बस जड़ को पानी देते रहो।
क्योंकि जो चीज समय लेकर बनती है,
वही सबसे मीठी और सबसे महान होती है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा, दिल्ली
स्वरचित मौलिक रचना
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