"समय का फल"
ज़िंदगी में धैर्य का दीप जलाए रखो,
हर चीज़ अपने वक्त पर ही पाए रखो।
बीज से कल ही वृक्ष नहीं बन जाता,
समय की धूप-छाँव से ही तन सज जाता।
मिट्टी के अंधेरे में पहले जड़ें जाती हैं,
बारिश के आँसू, धूप की आंचें खाती हैं।
तब कहीं जाकर तना आसमान छूता है,
और हर पत्ते पर नया सवेरा झूमता है।
ठीक वैसे ही मेहनत भी फौरन नहीं फलती,
संघर्ष की खाद से ही किस्मत की डाली खिलती।
इंतज़ार और हार जब जड़ों को सींचते हैं,
तब जाकर सपने ऊँचाइयों को छूते हैं।
अगर आज फल न दिखे तो घबराओ नहीं,
हो सकता जड़ें उस ऊँचाई को नाप रही हों कहीं।
जिसकी तुमने कल्पना तक न की होगी कभी,
उसी शाख पर बैठी हो खुशियाँ तुम्हारी अभी।
बस विश्वास रखो, कर्म करते जाओ,
सही समय की आहट को सुनते जाओ।
देर भले हो जाए, पर हार नहीं होगी,
सच्ची मेहनत कभी व्यर्थ नहीं होगी।
बीज अंधेरा सहकर ही वट वृक्ष बनता है,
और धैर्य रखने वाला ही इतिहास रचता है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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