आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पाप पुण्य, जीवन मरण, चरणों में लाया हूँ

                
                                                         
                            प्रभु तुमने हमें, प्रेम से रचाया है,
                                                                 
                            
अपना आनंद ही, हममें बाँटने को बनाया है।

पूछूँ हे नाथ, इस तन का धर्म क्या है,
तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान ही तो सार है।

गृहस्थ के पथ पर, भूख प्यास भी आती है,
निंदा स्तुति, सुख दुःख, सब परीक्षा लाती है।

तप कर भी सत्पथ पर, चलने का बल दे दो,
संघर्षों में भी स्वाध्याय का, संबल दे दो।

वैदिक ऋचाओं का सार, श्वासों में भर दो,
हर कर्म को भजन, हर क्षण को जप कर दो।

तन मन धन मेरा, सब तुझको अर्पण है,
मान अपमान, जय पराजय, सब तेरा तर्पण है।

पाप पुण्य, जीवन मरण, चरणों में लाया हूँ,
बस तेरी कृपा का, आँचल माँगने आया हूँ।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
49 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर