आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सफलता

                
                                                         
                            सहन करना सीखो, जीवन का सार है,
                                                                 
                            
हममें भी कमियाँ हैं, दूसरा सहता हजार है।

तन और मन का जब, संतुलन बनता है,
तभी तो जीवन में, सफलता मिलता है।

जो संतुलन खो देता, वही हार जाता है,
जो धीरज रखता है, वही पार जाता है।

बदले की भावना, मन में मत रखना,
खराब फल खुद ही, डाल से गिर पड़ता।

सफलता को सब, पाना तो चाहते हैं,
परिश्रम सभी, दिन-रात करते हैं।

पर सफलता इतनी, सहज नहीं मिलती,
कई बार कोशिशें, यूं ही बिखर जातीं।

असफल जो होते, दो राह अपनाते हैं,
कोई बहाने ढूंढता, समय गँवाते हैं।

कोई गलती को अपनी, सुधार लेता है,
वही शिखर पर, चढ़कर दिखाता है।

इसलिए बहाना नहीं, सुधार जरूरी है,
तभी तो जीवन में, जीत पूरी है।

-- जगदीश प्रसाद शर्मा, दिल्ली
स्वरचित मौलिक रचना
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर